रात की क़ैद में हैं उजाले

संजीवनी रात की क़ैद में हैं उजाले ।बैठे हम हाथ पर हाथ डाले लाश पहचान में आ सकी ना -चील कौओं ने यूँ नोच डाले।राज फैला है तब तब असत् का -सत्य ने जब भी हथियार डाले ।राह में आ गया जो भी पत्थर -पाँव से हम उसे तोड़ डाले ।रोएगी मौत पर मेरे दुनिया -देखकर के मुझे मुस्करा... [पूरी पोस्ट]
writer विनय ओझा 'स्नेहिल'
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[01 Jan 2010 05:25 AM]

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