मेरी ज़मीं....
इस बदले से सर्द मौसम में भी कोई सिरहन नहीं पैदा हो रही थी....वहां पहुंचकर उस ठंडे फर्श पर ...सिर्फ एक दरी पर बैठते ही कहीं कोई ठोस आधार सा मिलने जैसा महसूस हुआ.....हां आंखें बहुत कुछ समझना चाह रही थीं....उसकी बड़ी आंखों मे छुपी बातों को भी.....जिन्हें...
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tanu sharma.joshi
तुम....
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[01 Jan 2010 03:37 AM]



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