उनके लिए कुछ लिख डाला...
हिचक, झिझक में, बंद घरों मेंलोगों के, दुनिया के डरों मेंबेमतलब यूं उम्र गुज़ारीचलो आज फिर अपनी बारी....सोचता था कि क्या लिखूं तुमकोकि अक्षरों में सही, मैं भला दिखूं तुमकोलिखूं वो बात नयी जो तुम्हे हिला डालेजो सो गया तुममें, उसको फ़िर जगा डालेवो ग़लतियां वो...
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sanjaygrover
कविता
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[01 Jan 2010 02:13 AM]



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