लेखा-जोखा
लेखा-जोखा फिर नए साल ने दस्तक दी है,सर्द झोंको ने भी कसकर दी है.अपनी तकदीर हमें लिखना है,कोरे सफ्हात की पुस्तक दी है.बा मुरादों ने दुआए दी तो,ना मुरादों ने छक कर पी है.'तेल-आंगन' से न निकला फिर भी, हाद्सातों ने तो करवट ली है.बर्फ की तरह...
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Mansoor Ali
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[31 Dec 2009 22:30 PM]



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