गुरू प्रणाम

GORAKHH स्मरण और स्मृति का कालखंड उन गहरी रेखाओं की तरह है जो एक विराट अरण्य में अपने ही बिसरे-भटके प्रतिबिम्बों को तलाशने का उपक्रम करता हुआ शब्द की देहरी पर कुछ देर सांस लेने के लिए रूकता है। यह कविता है या समाधि! यह गुरू के सामने समर्पण है या स्वयं का अर्पण!... [पूरी पोस्ट]
writer Gopal Singh

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[29 Apr 2009 13:28 PM]

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