अरोगो
‘सबद’ पूर्ण है ‘शब्द’ से। अर्थ में ‘सबद’ वेद है। नानक से लेकर नाथों ने ‘सबद’ रचे। कबीर से लेकर दादू ने ‘सबद’ गाये। कुछ ‘सबद’ विस्मृति में हैं तो कुछ वाणियों में। कहते हैं सबद यथार्थ ज्ञान का मूल है, भव है। संत सबद की इस वाणी से होना सिखाते हैं (to be)।...
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Gopal Singh
sabad
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[03 Aug 2009 06:23 AM]



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