छताँगढ़-१

GORAKHH वो था बसंतकिसी थार के नूर में पककरखिल उठा अलसायी बयार के एक झौंके सा,अविश्वसनीय राग से लिपटबजने लगा हम सबकी तपती देह में।ओ! छताँगढ़ तुम्हारा आकाश तुम्हारी रेत औरतुम्हारा पानी हमने भरा है अंजुरी मेंतुम इजाजत दो तो दे लें अर्ध्य उन अंधेरों के किनारे उकड़ू... [पूरी पोस्ट]
writer Gopal Singh

कुछ शब्द जैसे मैं......

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[29 Aug 2009 06:25 AM]

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