छताँगढ़-2
भादो की तपती दोपहर में,सिक रही है रेत सुदूर समय की रेखाएंउभर आयी है ताजा लिपे आंगन परमांडणे जो कोरे गये हमारे स्वागत में।आगत एक झुलसन जैसे कोई छांव हवा में तैरतीमानों हमारे ही सूखे कालखण्डों नेचुना हो हमेंछताँगढ़ के लिए।हमें लटकाना है चांदइसी थार मेंताकि...
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Gopal Singh
कुछ शब्द जैसे मैं......
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[29 Aug 2009 06:26 AM]



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