रूस्वाइयां.................
हिफ़ाजत से संभाल कर रखा था दिल कमबख्त पल भर में तोड़ कर चले गएमेरे जिगर की वि·रासत के टुकड़े महबूब की गलियों में बिखर गएवो शायद चौदहवीं की रात थी और मौसमे बरसात थीसनम चले जा रहे थे अकेले ही नामालुम क्या बात थीपछियों की ना जाने कैसी चहचाहट हुई जमीं पर से...
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SUNIL DOGRA जालिम
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[22 Apr 2007 05:57 AM]



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