काश! मैं परिपूर्ण होता
अकेला सा महसूस करता हूं सौ करोड़ से ज्यादा की भीड़ में इसलिए सोचता हूं काश! मैं परिपूर्ण होता हर काम अपने दम पे करता कदम बढ़ाता समाज कल्याण की राह पर पर कभी किसी से मदद ना मांगता सोचता हूं मैं दीपक होता अंधियारा मिटाता इस जग का फिर ख्याल आता है...
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SUNIL DOGRA जालिम
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[18 May 2007 10:13 AM]



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