इन्कारे-इजहार

जालिम हिमाचली वे तॊ रूख्सत हॊ गए मेरी मॊहब्बत कॊ इन्कार कहके।बेरूखी यह जान के मेरी आखॊ अश्क भी ना बह सके॥पर यह ना समझ लीजिएगा कि हम उनसे खफा हैं।इश्क तॊ हमने किया है उनकी कहां कॊई खता है॥लेकिन इस कम्बख्त दिल कॊ समझाउँ अब मैं कैसै।उनकी नजरॊं ने फिर मुड के देखा सुकूं... [पूरी पोस्ट]
writer SUNIL DOGRA जालि‍म
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[13 Jul 2007 11:25 AM]

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