मैं तो बस कलम चलाता हूँ
गीत और ग़ज़लें नहीं जानतागद्य पद्य को नहीं मानता भावों को कहता जाता हूँ मैं तो बस कलम चलाता हूँनिर्मल सूर्योदय को जिस दिन देखूं पवन किरणों से लफ्ज बनाकर प्रियतमा का चित्र बनाता हूँ मैं तो बस कलम चलाता हूँ सावन के मेघों से रंग ले कर गरजती बिजली संग ले कर...
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SUNIL DOGRA जालिम
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[22 Sep 2009 08:29 AM]



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