अहसास का घर

ज़रिया-नज़रिया हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए, मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए। मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलीं उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए। जिसमें रहकर सुकूं से गुजारा करूँ मुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए। जिंदगी चाहिए मुझको मानी* भरी, चाहे कितनी भी हो मुख्तसर, चाहिए। लाख... [पूरी पोस्ट]
writer कन्हैयालाल नंदन

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[15 Aug 2008 12:49 PM]

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