" वजूद"
अब, कितना कठिन हो चला है.. कतरा-कतरा कर के पल बिताना. पल दो पल ऐसे हों , जब काम की खट-पट ना हो..इसके लिए हर पल खटते रहे.. बचपन की नैतिक-शिक्षा, जवानी की मजबूरी और अधेड़पन की जिम्मेदारियों से उपजी सक्रियता ने.. एक व्यक्तित्व तो दिया..पर... पल दो पल ठहरकर,...
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श्रीश पाठक 'प्रखर'
वजूद
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[10 Sep 2009 13:55 PM]



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