"तुम मुस्कुरा रही हो, गंभीर.."
विस्तृत प्रांगण तिरछी लम्बी पगडंडी अभी बस हलकी चहल-पहल , विश्वविद्यालय में, दूर; उस सिरे से आती तुम गंभीर, किन्तु सौम्य, मद्धिम-मद्धिम तुम में एक मीठा तनाव है, शायद, हर एक-एक कदम पर जैसे सुलझा रही हो, एक-एक प्रश्न. तुम मुस्कुरा...
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श्रीश पाठक 'प्रखर'
तिरछी लम्बी पगडंडी
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[10 Sep 2009 13:54 PM]



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