कुंवर बेचैन की एक रचना--- अंगुलियाँ थाम के
अंगुलियाँ थाम के खुद चलना सिखाया था जिसेराह में छोड़ गया राह पे लाया था जिसेउसने पोंछे ही नहीं अश्क मेरी आँखों सेमैंने खुद रो के बहुत देर हँसाया था जिसेछू के होंठों को मेरे मुझसे बहुत दूर गईवो ग़ज़ल मैंने बड़े शौक से गाया था जिसेमुझसे नाराज़ है इक शख़्स...
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श्रीश पाठक 'प्रखर'
अंगुलियाँ थाम के
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[16 Sep 2009 11:26 AM]



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