"...मुझमे तुम कितनी हो..?''
"...मुझमे तुम कितनी हो..?'' हर आहट, वो सरसराहट लगती है, जैसे डाल गया हो डाकिया; चिट्ठी दरवाजे के नीचे से. अब, हर आहट निराश करती है. हर महीने टुकड़ों में मिलने आती रही तुम देती दस्तक सरसराहटों से . सारी...
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श्रीश पाठक 'प्रखर'
आहट
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[23 Sep 2009 21:01 PM]



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