विरहिन की व्यथा

धनात्मक चिन्तन मेह की बूँद झरी बदरी,पसरी पसरी सब देह पिरानी भीजत खीझत छोड चले सखि रीझत रीझत बात न मानी सुनि अटारि कटारि लगेसुन कोयल कीर मयूर की बानी गाज गिरे ऐसे मौसम पे सखि जहँ भीतर आग और बाहर पानी ......... [पूरी पोस्ट]
writer उम्दा सोच
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[04 Sep 2009 06:30 AM]

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