‘पीछे बंधे हैं हाथ मगर शर्त है सफर...’

बाजे वाली गली न जाने कब से ताने सुन रहा हूं कि अपने भोपाली होने पर इतना ग़ुरूर रखते हुए भी अब तक भोपाल के लोगों की बात ही नहीं कर रहा. सचमुच. अपने लोग दिल के इतने क़रीब होते हैं कि उनके बारे में लिखने का ख्याल ही नहीं आता. खैर! जो कल तक नहीं किया वो आज किए लेते हैं.... [पूरी पोस्ट]
writer raajkumar keswani
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[24 Sep 2009 07:40 AM]

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