मन बंजारा

मेरी रचनाऍ अपनों की बस्ती थी फिर भी मन बंजारा हो गया जिस भी गाँव रुके हमवो ही प्यारा हो गया अपनों से दो मीठे बोल सुनने को मन तरस गया अपनी आँखों का हर सावन गेरों के कंधो पर बरस गया जब कभी दिखलाया है मुझसे बेगानों ने अपनापन अनायास चुभ गया है मुझको अपनों का बेगानापन... [पूरी पोस्ट]
writer विपिन बिहारी गोयल
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[13 Aug 2009 04:02 AM]

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