उसकी क्या खता है
खुद ही से पूछ कर हँसता है रोता है क्या कोई शख्स इतना भी तन्हॉ होता है पेड़ की डाली को समझ कर बाजू हौले से छूता है कस के पकड़ता है रोक कर राह चलते से पूछता है साथ दोगे मायूस चेहरा लिये खाली आखों से तकता है बिछे है कालीन और...
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विपिन बिहारी गोयल
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[15 Sep 2009 08:42 AM]



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