तेज धूप का सफ़र
छाँव का सकून मृग-मरीचिका बन छलता रहा तेज धूप का सफ़र यूँ ही चलता रहा राहबर भी सभी किनारा कर गए कद अपने ही साये का भी घटता रहा इस तपिश में कौन सी वो कशिश है क्या सोच कर ये फूल इस बंजर में खिलता रहा कदम दो कदम...
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विपिन बिहारी गोयल
कविता
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[17 Sep 2009 12:44 PM]



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