क्यों भूल जाऊँ मैं
स्मृति के दंश, पीड़ा ,छटपटाहट और तुम्हारा खिलखिलाना काश भूल जाऊँ मैं अनभिज्ञता, उपहास , ग्लानि बोध और तुम्हारा मुझसे नज़रें चुराना काश भूल जाऊँ मैं दु:स्साहस , आलोचनाएं , आत्म प्रवंचना और तुम्हारा शर्म से झुका सिर काश भूल जाऊँ मैं बस याद रहे वो शाम का...
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विपिन बिहारी गोयल
कविता
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[21 Sep 2009 11:54 AM]



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