मैं इसी शहर में हूँ
मुझ से ग्लानि का बोझ सहा ना जाएगा तुम मुझे कभी `मसीहा´ मत कहना मैं भीड़ में खड़ा होकर चिल्ला लुँगा मुझे मंच पर आने को मत कहना इस यंत्राणा में भी मैं मुस्करा लेता हूँ मुझे कहकहा लगाने को मत कहना उनके जज्बातों को ठेस बहुत...
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विपिन बिहारी गोयल
कविता
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[23 Sep 2009 13:53 PM]



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