नियति
इस जंगल मेंहर शामएक कहर बरपा होता हैसन्नाटा टूटता है जंगल काबन्दूकों की आवाजों से।बूट रौंदते हैंजंगल के सीने कोटूटती हैंकुछ व्हिस्की और रम कीखाली बोतलेंऔर एक मासूम पेंडुकीदम तोड़ देती हैतड़फ़ड़ा करचन्द खुरदुरे हाथों के बीच।00000हेमन्त कुमार...
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creativekona
कविता
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[26 Sep 2009 21:38 PM]



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