कविता : मानव अभिव्यक्ति
अपने ही जाल में फंसाबिलखता तड़पताकैद पक्षी की तरह आज़ादी खोजता |कल्पना की उड़ाने भरता अथाह सागर में सहारा तलाशता रेत के घर बनाता बिखेरता तोड़ता |वक़्त से जूझता स्वप्न में मुस्कराता अपनी ही लाठी से खुद को हांकता |चलता, रुकता रुक रुक कर चलताझूठ के दर्पण में...
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Deepak Kumar
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[04 Sep 2009 00:51 AM]



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