रात

kamlesh pandey कितनी भीअंधेरी - घनीक्यों न हो रातकोख में छिपी होती हैउजाले की किरण।कितना भीतुम क्यों न सताओकिसी को-अपने बच्चे को देखउभरती है तुम्हारे चेहरे परअब भी मुस्कान।अंधेरा-नहीं पहचानने देता हैखुद की शक्लऔरअंधेरे की उपजतमाम अनबुझी कामनाएंसुरसा की तरहफैलाती हैं... [पूरी पोस्ट]
writer kamlesh
views
12
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
0
[03 Aug 2009 09:34 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix