रात
कितनी भीअंधेरी - घनीक्यों न हो रातकोख में छिपी होती हैउजाले की किरण।कितना भीतुम क्यों न सताओकिसी को-अपने बच्चे को देखउभरती है तुम्हारे चेहरे परअब भी मुस्कान।अंधेरा-नहीं पहचानने देता हैखुद की शक्लऔरअंधेरे की उपजतमाम अनबुझी कामनाएंसुरसा की तरहफैलाती हैं...
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kamlesh
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[03 Aug 2009 09:34 AM]



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