चुप रहो

kamlesh pandey चुप रहोदिन अभीप्यारे नहीं हुएजिनसे थी उम्मीदअब तक हमारे नहीं हुए।किया थाहमने जिन पर जान से बढ़ भरोसामुंह मोड़ चले ऍसे, मानोकभी अपने ही नहीं हुए।चुप रहोदिन अभीरात से हैं स्याहदिख रहे हैंजो हमें रहवरमुंह फेरते ही झट वे सय्याद हुए।चुप बैठोकिदिन अभी... [पूरी पोस्ट]
writer kamlesh
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[04 Aug 2009 11:01 AM]

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