पत्थरों का शहर
ये शहर है पत्थरों का, बेगाना कोई नहींइन दरख्तो-शाख में अब, याराना कोई नहीं।शीशा-ए-बुत चूर होगा, इल्म है सबको मगर,इस मदरसे का खलीफा, मौलाना कोई नहीं।कब्र हैं, ताबूत भी हैं, दौड़ती लाशें यहां,कील सबके हाथ में है, अंजाना कोई नहीं।मुफलिसों की भीड़ में दो-चार...
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[01 Aug 2009 06:55 AM]



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