शजर पर एक ही पत्ता बचा है
शजर पर एक ही पत्ता बचा है हवा की आँख में चुबने लगा है नदी दम तोड़ बैठी तशनगी से समन्दर बारिशों में भीगता है कभी जुगनू कभी तितली के पीछे मेरा बचपन अभी तक भागता है सभी के खून में गैरत नही पर लहू सब की रगों में दोड़ता है जवानी क्या मेरे बेटे पे आई मेरी आँखों...
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JATINDER PARWAAZ
shairy
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[29 Jul 2009 04:24 AM]



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