सहमा सहमा हर इक चेहरा मंज़र मंज़र खून में तर
सहमा सहमा हर इक चेहरा मंज़र मंज़र खून में तर शहर से जंगल ही अच्छा है चल चिड़िया तू अपने घर तुम तो ख़त में लिख देती हो घर में जी घबराता है तुम क्या जानो क्या होता है हाल हमारा सरहद पर बेमोसम ही छा जाते हैं बादल तेरी यादों के बेमोसम ही हो जाती है बारिश दिल...
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JATINDER PARWAAZ
शायर
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[07 Aug 2009 10:11 AM]



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