ख्याल...

अपूर्ण बहुत दिनों बाद फिर से जी चाहा कुछ लिखूं, जंग खा गए लगते हैंदिल-ओ-दिमाग के पुर्जे,सूझ रहा है बहुत कुछ लेकिन कुछ रुकता ही नहीं !मक्खियों सी भिन-भिन है बस,कुछ सुन नहीं पा रहा कि कौन क्या कहना चाहता है आखिर! अजीब सी हलचल है रूकती ही नहीं बस हुए जाती है, हुए... [पूरी पोस्ट]
writer निपुण पाण्डेय
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[08 Aug 2009 06:43 AM]

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