घर का "दीपक"

रज़िया मिर्ज़ा “ सुनती हो? अभी तक तुम्हारा लाड़ला घर पहुंचा नहिं है’। रसोई से ज़रा बाहर तो आओ”! प्रोफ़ेसर अनिल अपनी पत्नी से बोले। हाल में ही कालेज से आकर बैठक में बैठी राजुल दैनिक पेपर में अपना मुंह लगाकर चुपके से अपने बाबू जी का गुस्सा देख रही थी। अपने हाथों को रुमाल... [पूरी पोस्ट]
writer रज़िया "राज़"
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[30 Aug 2009 05:38 AM]

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