.......दर्पण.....

रज़िया मिर्ज़ा जाने कैसा ये बंधन है? उजला तन और मैला मन है। एक हाथ से दान वो देता। दूजे से कंइ जानें लेता। रहता बन के दोस्त सभी का। पर ये तो उनका दुश्मन है। इन्सानो के भेष में रहता। शैतानों से काम वो करता। बन के रहता देव सभी का। पर ना ये दानव से कम है। चाहे कितने भेष... [पूरी पोस्ट]
writer रज़िया "राज़"
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[01 Sep 2009 02:16 AM]

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