औरत हूँ आईना नहीं
पहले तो अपने आप से नज़रें मिलाईये फिर चाहे हम पे शौक़ से तोहमत लगाईये मेहनत की भट्टियों में झुलसना तो छोडिये रिश्तों की आंच में ज़रा तप कर दिखाईये औरत हूँ आईना नहीं जो टूट जाउंगी इन पत्थरों से और किसी को डराईये बनना है ग़र अमीर तो बस इतना कीजिए ज़िस्मों...
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लता 'हया'
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[16 Aug 2009 04:35 AM]



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