तुम नहीं थी... पर तुम सही थी...
बुझते कशों के बीच...याद आई वो हर बात...जो तुमने हर कश के बीच...कही नहीं पर ...सही थी...हां...तुम नहीं थी... पर तुम सही थी...जब दम घोंटने लगे अपने ही विचार...और घुटनों के बीच सिर दिए...जागते रहे सारी रात...खुद में ही सिमटे... सिकुड़े से ...सिसकते रहे......
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हेमन्त वशिष्ठ
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[13 Aug 2009 02:10 AM]



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