हर रोज़ जीने की कोशिश करता हूं मैं...
नींद से बोझल आंखें लिए...हर सुबह अपने शरीर को ...किसी तरह ढोता हूं मैं...रात किस कदर बीत जाती है......कभी पता ही नहीं चलता...और कभी ...बीत ही नहीं पाती...दिनभर फिर जागता हूं...दिनभर टुकड़ों में सोता हूं मैं...... हां उस दिन ... उसी रात के साथ हर पल...हर...
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हेमन्त वशिष्ठ
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[21 Aug 2009 10:14 AM]



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