कुछ खो गया है ...
कमरे में रौशनी ना के बराबर है...बिखरे पलों को ...सहेजती... सन्नाटे की एक चादर....कई महींनों की गर्द से दबी है......दरवाजे की झिर्रियों से... छुप-छुपकर आते...रौशनी के साये...बिस्तर पर सिरहाने की तरफ...तुम्हे तलाशते हैं...जहां बैठना तुम्हें बहुत पसंद...
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हेमन्त वशिष्ठ
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[11 Sep 2009 15:36 PM]



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