बोल के लब आज़ाद हैं तेरे...
आवहुं सब मिलिकै रोवहुं भारत भाईहा हा भारत दुर्दशा देखी न जाई। भरतेन्दु हरिशचन्द्र की ये पंक्तियां उस समय भारत की दुर्दशा पर विलाप थी। यदि आज इन पंक्तियों को एडिट कर मीडिया दुर्दशा लिख दिया जाए तो ग़लत नहीं होगा। इन आम चुनावों में मीडिया द्वारा किये गये...
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vikas vashisth
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[05 Aug 2009 07:48 AM]



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