पुस्तक मेला या बाज़ार

जाते-जाते... अगस्त के महीने की आखिरी तारीख थी। पिछली रात हुई बूंदाबांदी से उमस हो गई थी। पसीने में तर बतर प्रगति मैदान पहुंचा। टिकट के लिए लगी लंबी लाइन को देखकर एकबारगी थोड़ा परेशान हुआ लेकिन अगले ही पल थोड़ी तसल्ली भी हुई। यह किसी सिनेमा की टिकट खिड़की नहीं थी... [पूरी पोस्ट]
writer vikas vashisth
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[16 Sep 2009 10:02 AM]

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