आदमी

मोक्ष मै रोज इस कुएँ मै झांकतापानी पर अपनी परछाई देखताआवाज भी लगाता हूँकि कोई सदा लौटकर आएगीऔर मुझे अपना पता बताएगीमगर सड़क परदौड़ती , हांफतीइन मशीनो नेमुझे बहरा बना दियाऔर अंधा भी.बादलों की उंचाईया नापतीइन इमारतों ने मुझे छोटा कर दियाइतना छोटाकि बच्चों के... [पूरी पोस्ट]
writer मोक्ष

कवितायें

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[02 Sep 2009 07:20 AM]