घुपती ह्रदय में बल्लम–सी जिसकी बात, उसे गपला ले गयी कलमुँही रात
वह खोड़ली कलमुँही (6 अगस्त 09) रात थी, जब प्रमोद उपाध्यायजी ज़िन्दगी की फटी जेब से चवन्नी की तरह खो गये। प्रमोद जी इतने निश्छल मन थे कि कोई दुश्मन भी कह दे उनसे कि चल प्रमोद… एक-एक पैग लगा लें, तो चल पड़े उसके साथ। उनकी ज़बान की साफ़गोई के आगे आइना भी पानी...
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अशोक कुमार पाण्डेय
प्रमोद उपाध्याय/स्मृति शेष
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[14 Aug 2009 12:35 PM]



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