....जहां मां के साथ बाजारों में बिकती हैं बेटियां
जहां एक ओर महिलाएं अंतरिक्ष में जा रहीं हैं, शासन सत्ता में साझीदार बन रहीं हैं, सबला बनने के हर जतन और जुगत में लगी हैं, वहीं बेरोजगारी, गरीबी, बेबसी और मुफलिसी की शिकार न जानें कितनी महिलाएं रोज मर कर जीने को अभिशप्त हैं। चंद सिक्कों के लिए ऐसी...
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एम. अखलाक
देह व्यापार
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[02 Sep 2009 16:04 PM]



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