नज़्म

नई क़लम  - उभरते हस्ताक्षर बेज़ार मैं रोती रही, वो बे-इन्तेहाँ हँसता रहा,वक्त का हर इक कदम, राहे जुल्म पर बढ़ता रहा। ये सोच के कि आँच से प्यार की पिघलेगा कभी,मैं मोमदिल कहती रही, वो पत्थर बना ठगता रहा। उसको ख़बर नहीं थी कि मैं बेखबर नहीं,मैं अमृत समझ पीती रही, वो जब भी ज़हर देता... [पूरी पोस्ट]
writer नई कलम - उभरते हस्ताक्षर
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[26 Aug 2009 11:27 AM]

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