ग़ज़ल
लहू पहाड़ के दिल का, नदी में शामिल है,तुम्हारा दर्द हमारी ख़ुशी में शामिल है.तुम अपना दर्द अलग से दिखा न पाओगे,तेरा जो दर्द है वो मुझी में शामिल है.गुजरे लम्हों को मैं अक्सर ढूँढती मिल जाऊँगी,जिस्म से भी मैं तुम्हे अक्सर जुदा मिल जाऊँगी.दूर कितनी भी...
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नई कलम - उभरते हस्ताक्षर
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[09 Aug 2009 13:37 PM]



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