ग़ज़ल

नई क़लम  - उभरते हस्ताक्षर कोई इक खूबसूरत, गुनगुनाता गीत बन जाऊँ ।मेरी किस्मत कहाँ ऐसी, कि तेरा मीत बन जाऊँ॥तेरे न मुस्कुराने से, यहाँ खामोश है महफ़िल।मेरी वीरान है फितरत, मैं कैसे प्रीत बन जाऊँ।।तेरे आने से आती है, ईद मेरी औ दीवाली।तेरी दीवाली का मैं भी, कोई एक दीप बन... [पूरी पोस्ट]
writer नई कलम - उभरते हस्ताक्षर
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[26 Aug 2009 11:36 AM]

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