इक शाम तनहा ढलने को है
इक शाम तनहा ढलने को हैइक सुबह से सूरज मिलने को हैवक्त के पाटे पर तार-तार हुएइक रूह नए कपड़े सिलने को हैसमंदर के तूफानों से गुजर आईइक कागज़ की कश्ती गलने को हैचिता की लपटों की गरमी पाकरजज्बातों की बर्फ पिघलने को हैअश्कों की बारिश में भीगकरदिल का मैल अब...
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अर्चना तिवारी
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[26 Jul 2009 10:18 AM]



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