उम्मीद
शामें ग़म तन्हाई के साज बजते रहेतेरे दर पर दिल के पैगाम भेजते रहेघटाओं की बेवफाई का गिला क्या करेंआँखों के समंदर में नमी सहेजते रहेवो गए ऐसे कि फिर न आए कभीक़दमों की आहट से मकान गूंजते रहेअश्कों से बुझी जली बस्ती दिल कीअरमानों की ख़ाक के गुबार लरजते रहेबन...
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अर्चना तिवारी
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[30 Aug 2009 13:19 PM]



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