अंधेरे में ( एक अंश)
अनखोजी निज-समृद्धि का वह परम उत्कर्ष,परम अभिव्यक्तिमैं उसका शिष्य हूँवह मेरी गुरू है,गुरू है !!वह मेरे पास कभी बैठा ही नहीं था,वह मेरे पास कभी आया ही नहीं था,तिलस्मी खोह में देखा था एक बार,आख़िरी बार ही।पर, वह जगत् की गलियों में घूमता है प्रतिपलवह फटेहाल...
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रंगनाथ सिंह
अंधेरे में - एक अंश
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[15 Dec 2009 05:05 AM]



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