संपादकगण बेबस करें गुमाश्तागीरी...
अभी अभी बीते आम चुनाव में खबरों को जब बाजार की सुनहली पालकी में झुला कर उपभोक्ता के सामने रखा गया, तो खूब हाय-तौबा मची। चारों ओर से यह आवाज उठने लगी कि पत्रकारीय मूल्य में गिरावट आ गयी है और ख़बरों को अर्थ के आधार पर तय किया जाने लगा है। आप कुछ भी छापें...
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हेमेन्द्र मिश्र
मीडिया मीमांसा
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[24 Jul 2009 02:11 AM]



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